मालवीय नगर अग्निकांड: मेटल रॉड से जुड़ी रीढ़ की हड्डी, कई लोगों की जान बचाने वाला दाने-दाने के लिए मोहताज!

दिल्ली अग्निकांड में गंभीर रूप से घायल हुए रोहित का परिवार इस समय बड़ी मुसीबतों का सामना कर रहा है। रोहित वो शख्स हैं, जो हादसे के समय रेस्टोरेंट में काम कर रहे थे। आग लगते ही उन्होंने पहले अपने साथियों की जान बचाई और उसके बाद खुद वहां से निकले। उनकी रीढ़ की हड्डी में मेटल रॉड जुड़ी है। इतनी मदद के बाद भी उनका परिवार आज दाने-दाने के लिए मोहताज हो गया है।

मालवीय नगर अग्निकांड: मेटल रॉड से जुड़ी रीढ़ की हड्डी, कई लोगों की जान बचाने वाला दाने-दाने के लिए मोहताज!

नई दिल्ली: देश की राजधानी में हुए अग्निकांड का दर्द अब तक कम नहीं हुआ है। बिहार के रहने वाले 26 साल के रोहित की जिंदगी उस हादसे के बाद से पूरी तरह बदल गई है। रोहित बेहतर भविष्य की तलाश में दिल्ली आए थे, उनकी जिंदगी 3 जून को हौज रानी के 'बेड एंड ब्रेकफास्ट' वावे रेस्टोरेंट में लगी आग के बाद पूरी तरह बदल गई है। रोहित उस किचन में काम करते थे। आग लगने के समय वे ड्यूटी पर थे।


बाल्टी से तोड़ी खिड़की

रोहित के साथ उस वक्त उनके गांव के दो साथी भी ड्यूटी पर थे। दोनों ऊपर काम कर रहे थे। आग लगने पर रोहित उन दोनों को बचाने के लिए ऊपर पहली मंजिल पर भागे। आग में फंसने के बाद तीनों ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया और सुरक्षित बाहर कूदने से पहले बाथरूम की बाल्टी से खिड़की तोड़ दी। रोहित ने पक्का किया कि उसके साथी पहले बाहर निकलें। इसके बाद वह सबसे आखिर में नीचे कूदे।

 

शरीर में कई जगह फ्रैक्चर

दिल्ली अग्निकांड के 15 दिनों बाद आज वह खिड़की एक्सटेंशन में अपने किराए के कमरे में बिस्तर पर पड़े हैं। उनकी रीढ़ की हड्डी को मेटल रॉड से जोड़ा गया है और उनके शरीर में कई जगह फ्रैक्चर हैं। रोहित ने हमारे सहयोगी TOI को बताया कि उन्हें किसी भी सरकार से कोई मुआवजा नहीं मिला है। उनकी बहन रेनू उनकी देखभाल कर रही हैं।

क्या मुआवजा काफी होगा

हमारा परिवार गुजारा करने के लिए संघर्ष कर रहा है। अगर मुआवजा मिल भी जाए तो क्या वह हमारे पूरे परिवार का गुजारा करने के लिए काफी होगा?

रेनू, हादसे में घायल रोहित की बहन

दो हफ्तों से खाना पहुंचा रहा NGO

जलती हुई इमारत से कूदने के बाद स्थानीय लोग रोहित को पास के एक प्राइवेट हॉस्पिटल ले गए थे, जहां उन्हें शुरुआती इलाज मिला। हालांकि, उनके परिवार के लिए आर्थिक स्थिरता की उम्मीद एक दूर का सपना जैसी है। कोई पक्की कमाई न होने, दवाइयों और आगे के इलाज के साथ-साथ आने-जाने के बढ़ते खर्चों की वजह से उनके दिन संघर्ष के बीच बीत रहे हैं। एक स्थानीय NGO ने पिछले दो हफ्तों से खाना देकर परिवार को सहारा दिया है। लेकिन फिर भी आगे क्या होगा, इस बात की अनिश्चितता का बोझ बढ़ता जा रहा है।



घरों का कम करती थीं पत्नी और बहन

आग लगने से पहले रोहित महीने के 12,000 रुपये कमाते थे। उनकी पत्नी और बहन परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिए मालवीय नगर में घरों में काम करती थीं। रोहित का छोटा बेटा (9 साल) दिल्ली में उनके साथ रहता है। वह घर पर ही पढ़ाई कर रहा है। उनका बड़ा बेटा बिहार में पढ़ रहा है। रोहित के काम न कर पाने और उनकी देखभाल के लिए दोनों महिलाओं को नौकरी छोड़नी पड़ी है। परिवार ने दोनों बच्चों की पढ़ाई भी रोक दी है। रोहित के परिवार को मुआवजे का इंतजार है। ताकी, फिलहाल कुछ राहत मिल सके।