सऊदी अरब, यूएई समेत 6 देशों की ब्रिक्स में होगी एंट्री, भारत का अंदाज क्यों बदला।
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सऊदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, अर्जेंटीना, इथियोपिया और मिस्र ब्रिक्स के नए सदस्य होंगे, जोहानिसबर्ग में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरील रामाफोसा ने नए सदस्यों के नाम का एलान किया।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए सदस्य देशों का ब्रिक्स परिवार में स्वागत किया है।
इससे पहले नरेंद्र मोदी ने बुधवार को दक्षिण अफ्रीका में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में पांच देशों के इस संगठन के विस्तार का समर्थन कर दिया था।
भारत की ओर से पहली बार ब्रिक्स के सदस्य देशों की सदस्यता बढ़ाने पर सहमति का एलान किया गया।
भारत ने अब तक ब्रिक्स के विस्तार का खुल कर समर्थन नहीं किया था, भारत और ब्राजील ब्रिक्स में सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने के लिए राजी नहीं थे, लेकिन बुधवार को भारत ने कहा कि ब्रिक्स के विस्तार के लेकर उसका रुख सकारात्मक है, वो खुले दिमाग से इसका समर्थन करता है।
सदस्यता के लिए औपचारिक आवेदन
दक्षिण अफ्रीकी अधिकारियों के मुताबिक़ लगभग 40 देशों ने ब्रिक्स की सदस्यता लेने में दिलचस्पी दिखाई है. सऊदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, बोलीविया समेत 23 देशों ने ब्रिक्स की सदस्यता के लिए औपचारिक तौर पर आवेदन कर दिया था।
नए सदस्यों को प्रवेश दिलाने के मामले को ब्रिक्स पर चीन के बढ़ते प्रभाव के तौर पर देखा जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने ब्रिक्स में नए सदस्यों को शामिल करने के मुद्दे पर ट्वीट करते हुए लिखा, "केवल पांच सदस्यों के साथ ब्रिक्स ने एक समान पहचान और एजेंडे को शक्ल देने और ग्लोबल मंच पर एकजुट और प्रासंगिक ताकत बनने के लिए संघर्ष किया है, लेकिन अब छह नए सदस्य देशों के आ जाने से ये काम कठिन हो जाएगा।
"ऐसा लगता है कि नए सदस्यों को शामिल करने के मामले में चीन की छाप है, जो रूस के समर्थन से ब्रिक्स को आक्रामक तरीके से विस्तार दे रहा है, जिस तरह चीन ने एससीओ को भारत को सिर्फ पाकिस्तान के साथ ही आने दिया उसी तरह अब ब्रिक्स में प्रतिद्वंद्वियों की जोड़ी में भारत और चीन के अलावा, तीन नए भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों जोड़े होंगे: ईरान और सऊदी अरब।

"मिस्र और इथियोपिया. ब्राज़ील और अर्जेंटीना. (अर्जेंटीना के प्रवेश को ब्राजील का समर्थन हासिल था.) ऐसे भू-राजनैतिक जोड़े के नए सदस्यों की सूची में एकमात्र अपवाद संयुक्त अरब अमीरात है, जिसके प्रवेश के लिए भारत ने जोर लगाया था, शी ने खुश होकर कहा- यह सदस्यता विस्तार ऐतिहासिक है।
ब्रिक्स की सदस्यता लिए इतना उत्साह क्यों?
जो देश ब्रिक्स की सदस्यता लेना चाहते हैं वे इसे डब्ल्यूटीओ, आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक और यूएन जैसे पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाले संगठन के विकल्प के तौर पर देखते हैं।
ग्लोबल साउथ के देशों को लगता है यहां उनकी ज्यादा सुनी जाएगी, उन्हें दूसरे सदस्य देशों के साथ मिल कर कारोबार, वित्तीय मदद और निवेश हासिल करने के ज्यादा मौका मिलेगा।
कई देश पश्चिमी वित्तीय और सहायता एजेंसियों की कड़ी शर्तों से परेशान हैं। लिहाजा वे ब्रिक्स देशों के न्यू डेवलपमेंट बैंक की मदद चाहते हैं।
मौजूदा विश्व व्यवस्था से इन देशों को सबसे ज्यादा निराशा कोविड महामारी के वक्त हुई थी, जब पश्चिमी धनी देशों ने जीवनरक्षक दवाओं की जमाखोरी शुरू कर दी थी।
अलग-अलग देशों ने ब्रिक्स की सदस्यता लेने की वजहें गिनाई हैं, ईरान और सऊदी अरब जहां अपनी विदेश नीति पर अमेरिकी असर कम करना चाहते हैं।
अर्जेंटीना और अल्जीरिया
वहीं अर्जेंटीना का विदेश मुद्रा भंडार खाली हो गया है, कर्ज चुकाने के लिए वो आईएमएफ से 44 अरब डॉलर का लोन लेने पर विचार कर रहा है।
ब्राजील के राष्ट्रपति लुईस ईनास्यू लूला डा सिल्वा ने अर्जेंटीना को सदस्य बनाने की वकालत करते हुए कहा कि आईएमएफ का कर्जा दमघोंटू है।
उनका कहना है ब्रिक्स बैंक इन देशों को आसान शर्तों पर कर्ज दे सकता है ताकि उनकी अर्थव्यवस्था रफ़्तार पकड़ सके।
अफ्रीका की सबसे तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था इथियोपिया को उम्मीद है कि ब्रिक्स में शामिल होने से उसके हित ज्यादा सुरक्षित रहेंगे, बोलीविया डॉलर पर निर्भरता खत्म करना चाहता है, उसका इरादा युआन में कारोबार बढ़ाना है।
जबकि तेल और गैस संसाधनों से लैस अल्जीरिया न्यू डेवलपमेंट बैंक (इसे ब्रिक्स बैंक भी कहा जाता है) का सदस्य बनना चाहता है, अल्जीरिया इसके जरिये अपनी अर्थव्यवस्था को डाइवर्सिफाई करना चाहता है, साथ ही वो चीन से अपनी पार्टनरशिप करना चाहता है।

